शहरी माओवाद – आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा

जंगल में हो रही हिंसा के पीछे इन्ही लोगों का दिमाग है |

शहरी माओवाद
शहरी माओवाद

ये केवल चंद उदाहरण हैं जिनके आधार पर, यह कहा जा सकता है कि गरीब आदिवासी केवल ‘शहरी माओवादियों’ के हाथों में कठपुतलियों या मोहरे हैं।

आज के समय में यह ज्ञात तथ्य है कि भारत के लगभग आधा दर्जन राज्य नक्सलवाद या माओवाद से प्रभावित हैं | पीछे कुछ सालों में मध्य भारत में हजारों की संख्या में सेना के जवान तथा आम आदमी माओवादियों द्वारा मारे जा चुके हैं | हर वर्ष भारत के सुरक्षाबल इन मओवादियो से निपटने का प्रयास करते हैं मगर आज तक यह समस्या बनी हुई है |  इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है की सुरक्षाबल जिस समस्या का हल गाँवों में खोज रहे हैं , उसकी जड़ असल में शहर में है | ‘शहरी माओवादी’ ही जंगल में फ़ैल रहे माओवाद की मूल जड़ हैं

स्थिति कुछ इस तरह है की  –

एक मशीन है जो नरभक्षी जानवर पैदा करती जा रही है और हमारे देश के सुरक्षाबल उन जानवरों को मारने में व्यस्त हैं | जबकी समस्या की मूल जड़ मशीन है, जब तक के इस मशीन को नहीं तोडा जाता तब तक हत्याओं का दौर समाप्त नहीं होगा |

शहरी माओवादी में पड़े लिखे पी.एच.डी. के छात्र , बड़े विश्वविध्यालय के कुछ लोग, प्रोफेसर, मीडियाकर्मी, वकील, तथा गैर सरकारी संगठनो के लोग जुड़े हुए हैं |

मशीन जो छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के जंगलों में नक्सलवादी और माओवादी पैदा कर रही है उसका नाम है ‘शहरी माओवादी’ | जंगल में हो रही हिंसा के पीछे इन्ही लोगों का दिमाग है | यह लोग कोई जंगल में बैठे हुए साधारण आदिवासी या गरीब लोग नहीं हैं बल्कि यह शहर में बैठे हुए सबसे चालाक और शातिर दिमाग वाले लोग हैं | इनमें पड़े लिखे पी.एच.डी. के छात्र , बड़े विश्वविध्यालय के कुछ लोग (जैसे जे.एन.यू , टाटा इंस्टिट्यूट[i], दिल्ली विश्वविध्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय आदि), प्रोफेसर, मीडियाकर्मी, वकील, थिंक टैंक तथा गैर सरकारी संगठनो के लोग जुड़े हुए हैं | यह सुनने में फ़िल्मी कहानी की तरह लगता है मगर यह आधुनिक भारत का सच है | शिक्षा के नाम पर कई शिक्षक , छात्रों का दिमाग बदल रहे हैं तथा उन्हें गलत दिशा में मोड़ रहे हैं | इन सभी को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी) का समर्थन प्राप्त है , यह एक प्रतिबंधित संगठन है मगर इसके बाद भी गुप्त रूप से यह देश में तथा कई विश्वविध्यालयो में संचालित है | इस लेख के शोध के दौरान कुछ तथ्य प्राप्त हुए जिससे साफ़ रूप से यह सिद्ध होता है की ग्रामीण और शहरी मओवादियो में आपस में गहरा संबंध है तथा शहरी माओवादी ही जंगल में फैले हिंसक माओवाद की जड़ हैं | ऐसे ही कुछ तथ्य निम्नलिखित हैं –

  • ६ सितम्बर, २००२ को बामदेव छेत्री को जे.एन.यू. से गिरफ्तार किया गया | गिरफ्तारी के समय, वह जेएनयू पुस्तकालय का कार्यवाहक था। वह पोटा कानून द्वारा प्रतिबंधित संगठन अखिल भारत नेपाली एकता समाज (ए.बी.एन.इ.एस) का भी हिस्सा था |[ii] जेएनयू का ही एक और छात्र बंशीधर उर्फ़ चिंतन जिसने वहां से एम्.फिल. तथा पी.एच.डी. किया था उसे भी माओवादी की मदद करने के इल्जाम में गिरफ्तार किया गया था |[iii]
  • अगस्त २०१३ में जेएनयू के ही एक और छात्र हेम मिश्रा को चंद्रपुर महाराष्ट्र में नक्सलियों की मदद के इल्जाम में गिरफ्तार किया गया था | जिसे बाद में कोर्ट ने छोड़ दिया था |[iv]
  • हाल ही में २०१४ में दिल्ली विश्विद्यालय के प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा तथा एक छात्र गोस्वामी ( डी.एस.यू. का सदस्य) को पुलिस ने मओवादियो से तार जुड़े होने के मामले में गिरफ्तार किया है |[v]
  • २०१५ में, सारे देश ने राष्ट्रीय चैनलों पर देखा था के किस तरह जेएनयू में अफज़ल गुरु की बरसी मनाते हुए कुछ छात्रों ने देश विरोधी नारे लगाये थे (जैसे- ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह’ या भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी) | इस मामले में भी जेएनयू के कन्हैया कुमार तथा उमर खालिद पर मुकदमा दर्ज हुआ था जिन्हें बाद में कोर्ट से छात्र होने के कारण रियायत मिल गयी थी |[vi]

यह सिर्फ चंद उदाहरण थे जिनसे यह साफ़ होता है की किस तरह बड़े शहर के कालेजो तथा छात्रों का माओवाद से तार जुड़ा हुआ है | यही नहीं यदि एक विश्वविध्यालय में किसी विषय को लेकर आन्दोलन होता है तो सभी विश्वविद्यालयों में वह शुरू हो जाता है | इसी तरह का एक आन्दोलन था जो आतंकी याकूब मेनन के समर्थन में शुरू हुआ था बाद में यह जेएनयू , जाधवपुर, हैदराबाद आदि सभी बड़े विश्वविध्यालयो में सुनियोजित ढंग से फैला दिया गया था | यही नहीं इनके साथ सामाजिक संगठनो तथा नामी वकील प्रशांत भूषण आदि ने आतंकवादी याकूब मेनन के समर्थन में आधी रात को कोर्ट खुलवा लिया था |[vii]

बिनायक सेन की गिरफ्तारी के केस में, भारतीय उच्च न्यायलय ने कहा था – ‘किसी भी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने से कोई अपराधी नहीं हो जाता जब तक के वो कोई अपराधिक गतिविधि या हिंसा ना करे |[viii] यह सब इसलिए संभव हो पाता है क्योंकि इन शहरी मओवादियो के तार बड़े वकीलों, फिल्मकारों, मीडियाकर्मियों , गैर सामाजिक संगठनो इत्यादि से जुड़े हुए हैं तथा समय समय पर यह सब इनकी मदद करते रहते हैं |

पांडा ने रायपुर में हो रही एक प्रेसवार्ता के दौरान कहा के वह बड़े माओवादी नेताओं तथा शहरी मओवादियो तथा समर्थकों के बीच की एकमात्र कड़ी तथा सम्पर्कसूत्र था|

हाल ही में 9 मई २०१७ को पोडियम पांडा नामक एक माओवादी ने छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण किया जिसका हाथ कई सी.आर.पी.ऍफ़. के जवानों की मौत के पीछे था |[ix] मगर आश्चर्यजनक बात यह नहीं थी की उसने आत्मसमर्पण किया बल्कि आश्चर्यजनक बात यह थी के आत्मसमर्पण के बाद पूछताछ के दौरान उसने अपने बयान में जिन लोगों के नाम लिए वो चौकाने वाले थे | इनमे से एक थी दिल्ली विश्वविध्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुन्दर और दूसरी सी.एस.डी.एस. की पूर्व फेलो तथा टाटा इंस्टिट्यूट की प्रोफेसर रही बेला भाटिया | पांडा ने रायपुर में हो रही एक प्रेसवार्ता के दौरान कहा के वह बड़े माओवादी नेताओं तथा शहरी मओवादियो तथा समर्थकों के बीच की एकमात्र कड़ी तथा सम्पर्कसूत्र था तथा इन्ही में नंदिनी सुन्दर तथा बेला भाटिया भी शामिल थीं | उसने कहा के वो कई बार जंगल में उन्हें बड़े माओवादी नेताओं से मिलाने के लिए ले गया था जिनकी कई केसों में पुलिस को तलाश है | उसने यह भी कबूल किया के वो दिल्ली के कार्यकर्ताओं से जानकारी लेकर बस्तर और सुकमा पहुचाया करता था |[x]  यह कबूलनामा शहरी और ग्रामीण मओवादियो की साठ-गांठ को साफ़ दर्शाता है |

नंदिनी सुन्दर के विषय में और भी जानकारियां सामने आयीं हैं जैसे – इन्होने माओवादी पांडा के बारे में  ‘द वायर’ में एक लेख लिखा था | ‘द वायर’ के फाउन्डिंग एडिटर हैं ‘सिद्धार्थ वर्धराजन’[xi] (यह नंदिनी सुन्दर के पति हैं) | इसी तरह बेला भाटिया के पति हैं ‘जीन ड्रीज’ ( बेल्जियम में पैदा हुए भारतीय नागरिक) | वह एक अर्थशास्त्री हैं जो रांची विश्वविद्यालय और दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स विश्वविद्यालय के साथ काम करते हैं। कमाल की बात यह है की यह यू.पी.ए. के दौरान सोनिया गांधी द्वारा बनायीं गयी एन.ए.सी. (नेशनल एडवाइजरी काउंसिल) के सदस्य भी थे |[xii] इससे ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है की शहरी माओवाद की पहुँच कहाँ तक हो सकती है |

मुख्य रूप से जर्मनी, फ्रांस, हॉलैंड और इटली उन राष्ट्रों में से माओवादियों को मदद मिलती रही है |

विदेशी फंडिंग – मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) विद्रोहियों को यूरोप में स्थित कुछ विदेशी संगठनों का समर्थन मिल रहा है । गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में  बताया था कि कुछ नक्सली विद्रोहियों को विदेशी धन प्राप्त करने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है, जिससे कि मुख्य रूप से जर्मनी, फ्रांस, हॉलैंड और इटली उन राष्ट्रों में से हैं जहाँ से माओवादियों को मदद मिलती रही है | उन्होंने आगे कहा- “सीपीआई (माओवादी) पार्टी का फिलीपींस और तुर्की के विदेशी माओवादी संगठनों के साथ भी घनिष्ठ संबंध हैं। उन्होंने कहा कि बेल्जियम और जर्मनी में आयोजित सम्मेलनों और सेमिनारों में भारतीय वामपंथी उग्रवाद समूहों ने भी भाग लिया है। विभिन्न मुठभेड़ों में वामपंथी चरमपंथियों से विदेशी मूल के हथियारों और गोला-बारूद की वसूली इस तथ्य का संकेत है कि वे विभिन्न स्रोतों से हथियार खरीद रहे हैं।

“इसके अलावा, सीपीआई (माओवादी) के गुप्त रूप से विदेशी धन प्राप्त करने से इनकार नहीं किया जा सकता है। ख़ुफ़िया जानकारी से यह भी पता चला है कि फिलीपींस की कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने 2005 और 2011 में सीपीआई (माओवादी) के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया”। (पीटीआई)|[xiii]

हाल ही में , फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने इसी विषय पर शहरी माओवादी मुद्दे को लेकर एक फिल्म बनायीं थी जिसका नाम था ‘बुद्धा इन अ ट्राफिक जाम’ | जब उन्होंने जाधवपुर विश्वविद्यालय में इस फिल्म को स्क्रीन करने की कोशिश की, तो वामपंथी छात्रों ने इसके खिलाफ बहुत विरोध किया और इसे कई बार बाधित किया गया | आश्चर्यजनक बात है की इस तरह की असहिष्णुता उन लोगों द्वारा दिखाई गयी जो स्वयं को ‘स्वतंत्रता के अधिकारो तथा अभिव्यक्ति की आज़ादी’ का संरक्षक कहते हैं |[xiv] ये केवल चंद उदाहरण हैं जिनके आधार पर, यह कहा जा सकता है कि गरीब आदिवासी केवल ‘शहरी माओवादियों’ के हाथों में कठपुतलियों या मोहरे हैं।  जब तक सरकार इन शहरी मओवादियो को शहरों में नहीं रोकेगी, तब तक वन में समस्या का समाधान कभी नहीं किया जा सकता है। इसलिए, जानवरों को मारने के बजाय हमें इन मशीनों को रोकना होगा, जो इन जानवरों का निर्माण कर रही हैं।

[i] http://indiatoday.intoday.in/story/maoist-strategy-urban-india/1/310739.html

[ii] http://www.satp.org/satporgtp/countries/india/terroristoutfits/ABNES.htm

[iii] https://www.telegraphindia.com/1100210/jsp/nation/story_12088371.jsp

[iv] http://www.thehindu.com/news/national/my-arrest-was-an-attempt-to-terrorise-student-community-says-hem-mishra/article7630270.ece

[v] http://indianexpress.com/article/cities/delhi/professor-saibaba-recruited-one-more-jnu-student-for-maoists-say-police/

[vi] http://indianexpress.com/article/opinion/columns/fifth-column-celebrating-indias-destruction-jnu-protest-kanhaiya-kumar/

[vii] http://www.hindustantimes.com/india/revisiting-a-late-night-hearing-to-save-memon-from-hanging/story-qMXtY0C7HpEMLeALlXYCgM.html

[viii] http://www.thehindu.com/news/national/Mere-membership-of-banned-organisation-not-a-crime-Supreme-Court/article15127515.ece

[ix] http://www.edunia.com/news/sukma-attack-naxalite-leader-of-sukma-attack-has-been-arrested-21-naxal-surrendered/

[x] http://www.firstpost.com/india/naxal-involved-in-sukma-attack-claims-du-prof-nalini-sundar-rights-activist-bela-bhatia-contacted-maoist-leadership-3454402.html

[xi] https://thewire.in/author/svaradarajan/

[xii] http://timesofindia.indiatimes.com/india/Jean-Dreze-asks-Sonia-not-to-extend-his-NAC-membership/articleshow/8958378.cms

[xiii] http://zeenews.india.com/news/nation/maoists-getting-support-from-european-organisations-mha-to-parliament_947614.html

[xiv] http://www.ndtv.com/india-news/buddha-in-a-traffic-jam-director-faces-protests-at-jadavpur-university-1403540

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Researcher and Writer at Think tank
Shubham Verma is a Researcher and writer based in New Delhi. He has an experience of 10 years in the field of Social work and Community development.
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