भारतीयों, अपनी संस्कृतियों और परम्पराओं को ‘रिलिजन’ कह कर अमृत को विष न बनाओ!

‘धर्म’ रिलिजन नहीं है, और ‘रिलिजन’ धर्म नहीं है.

रिलिजन
रिलिजन

रिलिजन एक विनाशकारी अवधारणा है. इस से दूर रहने की आवश्यकता है

भारत के वह लोग जिन पर ‘हिन्दू’ का लेबल लगाया जाता है
(a) उनका न तो कोई एक गॉड या अल्लाह है,
(b) न कोई एक क्राइस्ट या पैग़म्बर,
(c) न कोई एक किताब,
(d) न कोई एक ‘डॉक्ट्रिन’ या अक़ीदा, न कोई एक कलमा,
(e) न कोई एक चर्च, न कोई एक मक्का-मदीना,
(f) न कोई एक पोप या एक खलीफा की संकल्पना,
(g) न किसी चर्च को समाज की आस्था और नैतिकता तय करने का अधिकार,
(h) न कोई एक ही तरह की हज का हुक्म,
(i) न कोई सुन्नत पर चलने का हुक्म,
(j) न कोई एक कौम या उम्माह की संकल्पना,
(k) न किसी तरह की खिलाफ़त को कायम करने की अवधारणा,
(l) न सवाब (इनाम) पर आधारित जिहाद की संकल्पना
(m) न औरों को ‘कन्वर्ट’ करने का जूनून,
(n) न मिशनरी या तबलीगी जमा’अतें कायम करने की धुन,
(o) न सारी दुनिया में अपने चर्च या मस्जिद बना कर जनता को कंट्रोल करने की कोशिश,
(p) न किसी तरह का कोई कैनोनिकल लॉ या शरीअत,
(q) न किसी तरह की कोई एक्युमेनिकल या वैटिकन काउंसिल जो ‘डॉक्ट्रिन’ में बदलाव करे,
(r) न इस तरह की मान्यता या चेष्टा कि जिसे हम सत्य मानते हैं वह संपूर्ण विश्व पर लागू किया जाना चाहिए,
(s) न यह दावा कि हमारे तरीक़े पर चलने से ही मनुष्य को साल्वेशन या निजात मिलेगी,
(t) न apostasy या इर्तिदाद (‘रिलिजन’ को त्यागने) की अवधारणा और न उसकी सज़ा का डरावा.

तो फिर जिन लोगों पर ‘हिन्दू’ का लेबल लगाया जाता है वह किसी ‘रिलिजन’ को मानने वाले कैसे हुए?

और जिस चीज़ को ‘Hinduism’ कहा जाता है, वह एक ‘रिलिजन’ कैसे हुआ?

अपने आप को ‘ईसाई’ कहने वाले अपनी ‘ईसाइयत’ को ‘रिलिजन’ कहते हैं. वे ईसाइयत के ‘इतिहास’ को यहूदियत से जोड़ते हैं. सो यहूदियत भी ‘रिलिजन’ कहलाई.

अपने आप को ‘मुस्लिम’ कहने वाले अपने दीन को यहूदियत और ईसाइयत से जोड़ते हुए ‘पैगम्बराना’ परम्परा की अंतिम कड़ी मानते हैं. सो उन्हें भी अपने दीन को ‘रिलिजन’ कहलवाने में कोई आपत्ति नहीं.

पर जिन लोगों पर ‘हिन्दू’ का लेबल लगाया जाता है उनका ‘रिलिजन’ जैसी वाहेयात अवधारणा और साम्राज्यवादी व्यवस्था से कोई सम्बन्ध नहीं है.

बल्कि यह भी कहना पड़ेगा कि भारतीयता में ‘रिलिजन’ जैसी कोई अवधारणा लेश मात्र भी नहीं है.

‘रिलिजन’ में संस्कृति से परे एक बनावटी सामूहिकता और सबकी एक ही आस्था होने का ढोंग है, जबकी ‘धर्म’ की अवधारणा ऐसी है कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी धर्म हो सकता है.

‘रिलिजन’ में सोच, आस्था और कुछ हद तक सांस्कृतिक व्यवहार के मामले में समन्वयता (syncretism) को अस्वीकार किया जाता है ताकि सबकी एक ही आस्था होने का ढोंग बना रहे, जबकी भारतीयता की तो आत्मा ही ऐसी समन्वयता है.

इसलिए ‘धर्म’ रिलिजन नहीं है.

और ‘रिलिजन’ धर्म नहीं है.

यदि ‘हिन्दू’ कहलाने वाले लोगों में थोड़ी भी समझदारी है तो वे अपनी विविधता-पूर्ण संस्कृतियों और परम्पराओं को ‘रिलिजन’ की विनाशकारी अवधारणा के ढाँचे में ढलने से रोकेंगे — न कि स्वयं ही उन पर ‘रिलिजन’ का झूठा लेबल लगाकर अमृत को भी विष बनाने की मूर्खता करेंगे.

3 COMMENTS

  1. Great article by Mr Bajaj. Sadhuwad to him. The liberal and psuedo secular Hindus are real threat to their own existence. A Hindu is always secular. We put whole world in front of us.

    We are being crushed under load of the Islamic and Western culture. The Apathy is killing us in our own home. We must learn to face the threats with bravery.

  2. Beautifully written, and comprehensively so.
    Warmest congratulations to the author, mr. Bataj. This is a huge public service.

  3. Islam n Xianity have faIth in unverified & unverifiable.

    They can not prove what they say about God or Allah — who where, why, when, how?

    So they get angry2kill or bribe2convert.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here