हिन्दू और बौद्ध अलग धर्म नहीं हैं: तथ्यपूर्ण विश्लेषण | भाग २

बौद्ध और हिन्दू असल में एक ही विशाल सनातन परंपरा के अंग हैं, लोगों को यह समझना चाहिए तथा युवाओं को अपने सही इतिहास का तर्कपूर्ण ज्ञान देना चाहिए

हिन्दू और बौद्ध अलग धर्म नहीं हैं
हिन्दू और बौद्ध अलग धर्म नहीं हैं

इस श्रृंखला के भाग १ को यहां पर पहुंचा जा सकता है|

तीसरे तर्क के विषय में राजीव मल्होत्रा अपनी पुस्तक “द बैटल फॉर संस्कृत” लिखते हैं के –

“बुद्ध से २००० साल पहले इंडस सरस्वती सिविलाइज़ेशन थी जिनकी लिपि भी थी तथा कई सारा साहित्य इनके समय में लिखा गया है | अतः यह बात बिलकुल निरर्थक है के बौद्ध धर्म के आने के बाद भारत में लेखन की शुरुआत हुई |”[i]

इसमें एक तथ्यपूर्ण बाद यह भी है के यदि “पाली भाषा का इतिहास पढ़ा जाए तो पता चलता है यह बुद्ध के काफी बाद में विकसित हुई है | अतः बुद्ध के प्रवचन पाली में नहीं थे | बल्कि बाद में लोगों ने उन्हें पाली में लिखा है | कई लोगों का मत यह भी है के बुद्ध के काफी प्रवचन संस्कृत में ही थे |

अथर्व वेद में काव्य के विषय में लिखा गया है के काव्य वो है जो कभी पुराना नही होता , जो कभी खत्म नही होता , उसके कई अर्थ निकाले जा सकते हैं |

चौथा तर्क जिसमे पोलक कहते हैं – “संस्कृत तथा वैदिक धर्म में पहले सिर्फ कर्मकांड थे इसमें अन्य ज्ञान वर्धक चीजे जैसे काव्य, नाटक आदि बौद्धों के संस्कृत को अपनाने और उदार बनाने के बाद में जुड़े”|[ii] यह बात भी तथ्यहीन दिखाई पढ़ती है क्योंकि वेदों में प्राचीन समय से काव्य का जिक्र होता आया है | इसके कुछ उदाहरण हैं  –

अथर्व वेद में काव्य के विषय में लिखा गया है के काव्य वो है जो कभी पुराना नही होता , जो कभी खत्म नही होता , उसके कई अर्थ निकाले जा सकते हैं | कोई इसे कविता कह सकता है तो कोई बाहरी रहस्यों से जोड़ सकता है |”[iii]

इसी तरह प्रसिद्द जर्मन शब्दकोष “वाटरबच(१८५५-१८७५)” में इक्यावन (51) बार सिर्फ वेदों के सन्दर्भ में “काव्य” शब्द का प्रयोग है | इसमें स्तुति, कला , प्रेरणा इत्यादि के काव्यों का वर्णन है |[iv] राजशेखर ने भी नवी शताब्दी में “काव्यमीमांसा” में काव्य का वर्णन किया है | इसी तरह के. कृष्णामूर्ति ने “भंडारकर ओरिएण्टल शोध संस्थान” के वॉल्यूम ७२/७३, नं १/४ , अमृतमहोत्सव (१९१७-९२), पृष्ठ संख्या ७१-७७ में छपे उनके लेख “पोएटिक आर्टिस्ट्री इन वैदिक लिटरेचर” में यह जिक्र किया है के किस तरह वेदों में अपार श्रद्धा होते होते हुए भारत में इन्हें काव्यों की तरह भी लिया गया है |

ऐसे ही यजुर्वेद (३०.६) में नायक, नृत्य तथा संगीत का वर्णन है और ऋग्वेद में ‘नृत्यु’ शब्द का प्रयोग किय गया है , जिसका अर्थ है महिला नृतकी |[v] इस तरह के कई उदाहरण वैदिक साहित्य में भरे पढ़े हैं जिन्हें ना सिर्फ भारतीय बल्कि कई पश्चिमी विद्वानों ने भी कई जगह उल्लेखित किया है | अतः पोलक का चौथा तर्क जो यह कहता है के बुद्ध के आगमन के पूर्व संस्कृत तथा वैदिक संस्कृति में कर्मकांड के सिवा कुछ नहीं था यह उचित नहीं लगता |

पोलक का भी यह कहना के रामायण को ब्राह्मणों ने जातक से उठाया और वैदिक धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए प्रयोग किया यह गलत प्रतीत होता है

पांचवा तर्क जिसमें यह कहते हैं के रामायण ब्राह्मणों द्वारा बुद्ध के बाद, जातक की कथा को पढ़कर गढ़ी गयी है तथा जातक कथाएं भारत में पहला लिखित साहित्य है |[vi] इस तर्क को कई जगह पर कई विद्वानों ने चुनौती दी है | उन्ही के कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं –

पश्चिमी विद्वान रोबर्ट गोल्डमेन जो खुद पोलक के साथी रहे हैं , वह मानते हैं के जातक कथाओं में वाल्मीकि रामायण से सन्दर्भ लिया गया है क्योंकि जातक वाल्मीकि रामायण के काफी बाद लिखी गयी है | गोल्डमेन यह भी कहते हैं के पोलक ने उनके तर्क – “रामायण जातक के बाद लिखी गयी है” को   “दशरथ जातक” का प्रयोग करके जो रखा है , इसका सन्दर्भ उन्होंने वेबर के उन्नीसवी शताब्दी के “दशरथ जातक” पर किये गये विश्लेषण से उठाया है तथा वेबर का यह विश्लेषण तथा निष्कर्ष अब पश्चिम में नकारा जा चूका है तथा गलत सबित हो चूका है | अतः पोलक का भी यह कहना के रामायण को ब्राह्मणों ने जातक से उठाया और वैदिक धर्म को पुनः स्थापित करने के लिए प्रयोग किया यह गलत प्रतीत होता है | [vii]

वैदिक धर्म के साहित्य में ना सिर्फ यज्ञ बल्कि इतिहास, नाट्य – शास्त्र, योग, तंत्र , कला , संगीत आदि बहुत कुछ प्रमाणिक रूप से है|

छठे तर्क जिसमे यह कहते है की वैदिक धर्म बुद्ध से पहले सिर्फ यज्ञ आदि पर आधारित था तथा इसके साहित्य में सामाजिक रूडीवादिता के सिवा कुछ नहीं था | यह तथ्य भी एकदम बचकाना सा मालूम पड़ता  है , क्योंकि वैदिक धर्म के साहित्य में ना सिर्फ यज्ञ बल्कि इतिहास, नाट्य – शास्त्र, योग, तंत्र , कला , संगीत आदि बहुत कुछ प्रमाणिक रूप से है तथा ऐसी कई और चीजों के उदाहरण वैदिक साहित्य तथा वैदिक काल के समय के मिलते हैं जो यज्ञ के अलावा संस्कृति, सभ्यता, प्रकृति दर्शन शास्त्र आदि पर आधारित हैं | वेदों को लिखने वालों में भी गार्गी जैसी विदुषी महिलाएं तथा अनेको भिन्न भिन्न कुल के व्यक्तियों का हाथ रहा है | अतः यह कहना के बुद्ध से पहले यहाँ सिर्फ यज्ञ होते थे एवं यह ब्राह्मणों के कब्जे में था | यह पुर्णतः गलत है , क्योंकि रामायण को की सिद्ध हो चूका है बुद्ध के काल से पहले लिखी हुई है , उसे वाल्मीकि ने लिखा था जो जन्म से शुद्र वर्ण के थे | इसी तरह के कई उदाहरण वैदिक संस्कृति में मिलते हैं जिससे यह सिद्ध होता है के सामाजिक रुदिवादिता का इस सभ्यता में कोई स्थान नहीं था बल्कि सामाजिक समरसता और एकता प्रमुख रूप से इस काल में देखी गयी है |

इस तरह के ऐसे कई तथ्य हैं जिनसे यह साबित होता है की बुद्ध और सनातन दो अलग अलग धर्म नहीं हैं बल्कि एक ही भारत की विशाल परंपरा के अंग हैं तथा दोनों में कोई भेद नहीं है | कुछ लोग दलित समाज को हिन्दुओं से काट कर उन्हें दूसरे मजहब में परिवर्तित करने के लिए यह नफरत के बीज बो रहे हैं मगर उनकी भारत को तोड़ने की यह चाल कभी कामयाब नहीं हो सकती क्योंकि भारत के हिन्दू समाज के सभी वर्गों के लोग अब इन बातो को समझने लगे हैं तथा जैसे ही कोई सच जानने का प्रयास करता है | वह भारत के असली इतिहास तक पंहुच ही जाता है तथा इन झूठे भ्रामक साहित्यों का पर्दाफाश कर देता है | इसी तरह का एक प्रयास इस लेख में भी किया गया है | बौद्ध और हिन्दू असल में एक ही विशाल सनातन परंपरा के अंग हैं तथा इनमे भेद डालने वाले भारत को तोडना चाहते हैं , लोगों को यह समझना चाहिए तथा युवाओं को अपने सही इतिहास का तर्कपूर्ण ज्ञान देना चाहिए |

[i][i] Rajiv Malhotra.The Battle For Sanskrit.pp. 387-388.

[ii] Pollock 2006:75-76.

[iii] Atharva Veda: 10.8.32

[iv] Sanskrit Worterbuch (Sanskrit German Dictionary of 7 volumes) authored by Bohtlingk and Roth(1855-1875, published from St. Petersburg)

[v]  Rajiv Malhotra.The Battle For Sanskrit.pp. 416-417.

[vi] Pollock 1986:37-38.

[vii] Goldman 1984:32

 

 

 

Note:
1. Text in Blue points to additional data on the topic.
2. The views expressed here are those of the author and do not necessarily represent or reflect the views of PGurus.

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